प्रभावती देवी सीएचसी की बदहाली ने खोली ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल।
संवाददाता महर्षि टाइम्स
बैरिया (बलिया)। ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के सरकारी दावों के बीच बैरिया क्षेत्र स्थित प्रभावती देवी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की बदहाल व्यवस्था सवालों के घेरे में है। अस्पताल में लगा आरओ प्लांट पिछले कई महीनों से बंद पड़ा है। वहीं, एक हैंडपंप पूरी तरह टूट चुका है और दूसरा खराब होने के कारण मरीजों व तीमारदारों को मजबूरी में आर्सेनिक युक्त पानी पीना पड़ रहा है। अस्पताल आने वाले मरीजों का कहना है कि इलाज के लिए दूर-दराज से आने के बाद उन्हें पीने के साफ पानी तक के लिए भटकना पड़ता है। गर्मी के मौसम में स्थिति और भी गंभीर हो गई है। सीएचसी में कार्यरत फार्मासिस्ट आशुतोष कुमार त्रिपाठी ने बताया कि अस्पताल परिसर में टाइल्स और पत्थर लगाने का कार्य कराया जा रहा था। इसी दौरान आरओ प्लांट को हटाकर किनारे रख दिया गया। निर्माण कार्य पूरा होने के बावजूद आज तक उसे दोबारा स्थापित नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि शुद्ध पेयजल की व्यवस्था न होने से मरीजों और उनके परिजनों को भारी परेशानी झेलनी पड़ रही है। अस्पताल में तैनात डॉ. सौरभ कुमार गिरी ने भी माना कि स्वच्छ पेयजल की अनुपलब्धता गंभीर समस्या बन चुकी है। उन्होंने बताया कि प्रतिदिन बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए आते हैं, लेकिन पानी की समुचित व्यवस्था न होने से लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।गौरतलब है कि वर्ष 2023 में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह की अगुवाई में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अस्पताल का दौरा किया था। उसी दौरान अस्पताल का नाम प्रभावती देवी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रखा गया था तथा मुरली छपरा ब्लॉक की ओर से आरओ प्लांट भी स्थापित कराया गया था। लेकिन महज छह महीने बाद ही आरओ प्लांट खराब हो गया और तब से उसकी मरम्मत तक नहीं कराई गई। स्थानीय निवासी जनार्दन सिंह, प्रेम किशोर सिंह, नंदलाल यादव और प्रेम कुमार सिंह ने आरोप लगाया कि जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही के कारण सरकारी धन से लगाई गई सुविधा शोपीस बनकर रह गई है। उनका कहना है कि अस्पताल में प्रतिदिन सैकड़ों मरीज आते हैं, लेकिन पीने के लिए साफ पानी तक उपलब्ध नहीं है। मामले पर मुरली छपरा ब्लॉक के खंड विकास अधिकारी शकील अख्तर अंसारी ने कहा कि उन्हें इस समस्या की जानकारी नहीं थी। उन्होंने आश्वासन दिया कि एक सप्ताह के भीतर आरओ प्लांट और खराब हैंडपंपों को ठीक करा दिया जाएगा। अब बड़ा सवाल यह है कि मरीजों की सेहत से जुड़े इतने गंभीर मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही कब तय होगी, और क्या सरकारी अस्पतालों में शुद्ध पेयजल की व्यवस्था सिर्फ कागजी दावों तक ही सीमित रह जाएगी?



