ब्यूरो रिपोर्ट प्रदीप कुमार पाण्डेय।
गाज़ीपुर। जनपद के तहसील मुहम्मदाबाद अंतर्गत ठंड की कंपकंपाती सुबह, भीगी आँखों वाले बूढ़ों से लेकर काँपते बच्चों तक—सेमरा–शेरपुर गांव के सैकड़ों बाढ़ पीड़ित बुधवार को उम्मीद की आखिरी डोर थामे तहसील परिसर पहुँचे। हाथों में एक पत्रक और दिल में वर्षों की वेदना… सबने उपजिलाधिकारी डॉ. हर्षिता तिवारी से बस एक ही गुज़ारिश की—“मैडम, हमें भी रहने को थोड़ी-सी जमीन मिल जाए।”
इन परिवारों की पीड़ा कहानियों में नहीं, उनके फटे बिस्तरों, भीगे लत्तों और थकी निगाहों में दर्ज है। वर्ष 2013 से शुरू हुआ बाढ़ का दर्द अब 12 वर्षों की लंबी त्रासदी बन चुका है। हर वर्ष गंगा की वेगवती धारा इनका घर-आँगन, सपने और मेहनत से खड़ी की गई झोपड़ियाँ बहा ले जाती हैं। कभी कटान, कभी पानी का बढ़ाव—हर बार इन्हें अपना ठिकाना छोड़ना पड़ता है, जैसे जीवन इनका नहीं, बस कोई अस्थायी पड़ाव हो।
जो जमीन अस्थाई तौर पर इन परिवारों के सिर पर छत बनकर खड़ी है, वहाँ न बिजली है, न पानी… और न ही सुरक्षित रातें। कड़कड़ाती ठंड में बच्चों के नीले पड़े होंठ, बुज़ुर्गों की थकी साँसें और महिलाओं की आंसुओं से भीगी चुनरी—सब कुछ बता रहा था कि ये सिर्फ जमीन नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की खोज में आए हैं।
“हम कितनी बार कहें? सुना ही नहीं जाता हमारी तकलीफ़… बच्चे ठंड से बिलखते हैं, पर किसके पास जाएँ?”—एक वृद्ध की टूटी आवाज़ जैसे सन्नाटे को चीर गई।
परिवारों ने प्रशासन से मांग की कि जिस जमीन पर वे लंबे समय से आश्रय लेकर जी रहे हैं, उसकी नापी कराकर उनको स्थाई पट्टा दे दिया जाए, ताकि उनके जीवन में भी स्थिरता और सम्मान लौट सके। बार-बार उजड़ते-उजड़ते अब उनमें बस एक ही चाह बची है—एक अपना घर, एक अपना ठिकाना, जहाँ अगले साल की बाढ़ उनका सबकुछ फिर से न लूट सके।
पत्र सौंपने वालों में संतोष कुमार, प्रहलाद, शिवनारायण, हरिशंकर, हीरालाल सहित सैकड़ों लोगों ने अपने हस्ताक्षर किए—मानो हर हस्ताक्षर कह रहा हो:
“अब और नहीं… हमारी पीढ़ियाँ भी अपनी जमीन पर हक से जी सकें।”
उनकी उम्मीदों का कारवां आज तहसील के आँगन में खड़ा था—इस भरोसे के साथ कि शायद इस बार, किसी दफ़्तर के बंद दरवाज़े से एक नई शुरुआत की किरण बाहर आएगी।
