मनुष्य पर तीन श्रृण होता है। देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण।
महर्षि टाइम्स अवधेश पाण्डेय
बलिया। प्रत्येक मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण होते हैं। पहला देव ऋण, दूसरा ऋषि ऋण और तीसरा पितृ ऋण। पितृपक्ष में श्रद्धापूर्वक श्राद्ध कर्म करके परिजन अपने तीनों ऋणों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। श्राद्ध में काला तिल और कुशा का सर्वाधिक महत्त्व होता है। श्राद्ध में पितरों को अर्पित किए जाने वाले भोज्य पदार्थ को पिंडी रूप में अर्पित करना चाहिए। श्राद्ध का अधिकार पुत्र, भाई, पौत्र, प्रपौत्र समेत महिलाओं को भी होता है। जानकारी के अभाव में अधिकांश लोग श्राद्धकर्म को उचित विधि से नहीं करते जो दोषपूर्ण है। क्योंकि शास्त्रानुसार *पितरो वाक्यमिच्छन्ति भवमिच्छन्ति देवता* अर्थात देवता भाव से प्रसन्न होते हैं और पित्रगण शुद्ध एवं उचित विधि से किए गए कर्म से।
मेरे दादाजी स्वर्गीय मर्याद पांडेय जी पारिवारिक ज्ञान से परिपूर्ण थे और जब भी संभव होता, उस ज्ञान को हमेशा व्यक्त करते थे । उन्होंने हमें परिवार के महत्व और एक-दूसरे का ख्याल रखने का महत्व समझाया। उन्होंने हमें शिक्षा का महत्व भी सिखाया। उनकी मदद करने और हमें सलाह देने का तरीका ऐसा था जिससे हमलोगो की ज़िंदगी थोड़ी आसान हो जाती है
उनका महत्व वे परिवार के एक इतिहासकार, मार्गदर्शक, सहपाठी, पालन-पोषणकर्ता, आदर्श, विश्वासपात्र, सलाहकार और के रूप में कार्य किये
मेरे दादा जी एक महान व्यक्ति थे। वो एक दृढ़ संकल्प वाले इंसान थे।
*यह पूर्ण वक्या हमारे पूज्य बाबा स्वर्गिय मर्याद पांडेय जी को अर्पित करता हू*
*पौत्र*
*सत्येंद्र पांडेय*
*पटेल नगर चितबड़ागांव*
*बलिया*
