महिला पत्रकार से दुर्व्यवहार: जिला अस्पताल बना मनमानी का अड्डा, सरकार के आदेश सिर्फ कागज़ों तक

MAHARSHI TIMES
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बाइट महिला पत्रकार कंचन सिंह 

रिपोर्ट दिनेश गुप्ता 

बलिया। उत्तर प्रदेश सरकार जहां एक ओर स्वास्थ्य सेवाओं को संवेदनशील, जवाबदेह और जनहितकारी बनाने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं जमीनी हकीकत इन दावों को खुली चुनौती देती नजर आ रही है। मंगलवार दोपहर जिला अस्पताल बलिया में जो हुआ, उसने पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

ओपीडी में बैठे चिकित्सक—डॉ. करण सिंह चौहान—ने एक महिला पत्रकार के साथ जिस प्रकार का दुर्व्यवहार किया, वह न केवल निंदनीय है, बल्कि पूरी चिकित्सा व्यवस्था पर एक काला धब्बा है। महिला पत्रकार कंचन सिंह, जो क्षेत्र में सामाजिक और जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाने के लिए जानी जाती हैं, जब एक मरीज के मेडिकल परीक्षण के लिए डॉक्टर से अनुरोध करने पहुंचीं, तो उन्हें सहयोग मिलना तो दूर, अपमान और अभद्रता का सामना करना पड़ा।

क्या यही है वह “संवेदनशील स्वास्थ्य व्यवस्था” जिसकी बात योगी आदित्यनाथ सरकार करती है? क्या सरकारी अस्पतालों में अब इंसानियत की कोई जगह नहीं बची?

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मामला जब सीएमएस तक पहुंचा, तब जाकर डॉक्टर को फटकार लगी और मजबूरी में माफी मांगनी पड़ी। सवाल यह है कि क्या यह माफी वास्तविक है या सिर्फ औपचारिकता निभाने का एक दिखावा? अगर एक पत्रकार—जो समाज की आवाज उठाती है—उसके साथ ऐसा व्यवहार हो सकता है, तो आम गरीब मरीजों के साथ क्या होता होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।

डॉक्टर को समाज में “देव तुल्य” माना जाता है। लेकिन जब वही देवता अहंकार और असंवेदनशीलता के दलदल में उतर जाएं, तो व्यवस्था को सख्त हस्तक्षेप करना ही होगा। यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम में फैली लापरवाही, अनुशासनहीनता और जवाबदेही की कमी का प्रतीक है।

यह भी गंभीर जांच का विषय है कि आखिर ऐसे चिकित्सक किसके संरक्षण में इतने बेखौफ हैं? क्या उन्हें प्रशासनिक कार्यवाही का कोई डर नहीं? या फिर ऊपर से ही उन्हें खुली छूट मिली हुई है?

सीएमओ और स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। क्या सिर्फ फटकार और माफी से मामला खत्म मान लिया जाएगा? या फिर ऐसे डॉक्टरों के खिलाफ कड़ी विभागीय कार्यवाही भी होगी

बलिया का जिला अस्पताल, जो आम जनता के इलाज का केंद्र होना चाहिए, कहीं न कहीं “मनमानी और दबंगई” का अड्डा बनता जा रहा है। अगर समय रहते इस पर लगाम नहीं लगी, तो यह स्थिति और भयावह हो सकती है।

सरकार को चाहिए कि इस मामले को गंभीरता से लेते हुए न सिर्फ संबंधित डॉक्टर पर कठोर कार्रवाई करे, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र में अनुशासन और जवाबदेही सुनिश्चित करे। वरना “जनसेवा” के नाम पर चल रहा यह ढांचा जनता के विश्वास को पूरी तरह तोड़ देगा।

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