महर्षि टाइम्स
रसड़ा (बलिया)डाला छटठपर्व सूर्यषष्ठीपर्व को लेकर फलो की दुकाने सजने लगी है जिसमे स्थाई फलो के दुकानो के आलावा पटरियो पर नारियल माटीकटहल अनानास डाभ सेव केला संतरा पानीफल सिघाड़ा आदि फलो की दुकाने सज गयी वहीं बांस से बना सूप दवरी कूस (मूज) से बने डलिया आदि की भी दुकाने लगी है लोग अगामी 7नवम्वर दिन शुक्रवार को होने वाले डाला छठ सूर्य षष्ठी पर्व के लिए फल आदि समाग्री पहले से ही खरीद कर ले जा रहे है लोग अपने घरो की नगर सहित ग्रामीण क्षेत्रो साफ सफाई कार्य शुरू हो गया है दिपावली गोबर्धन पूजा के बाद छठ पर्व का बड़ा महत्व है इस पर्व पर महिलाएं गाय के गोबर से जहां पूजा चढ़ाने के लिए प्रसाद बनाया व रखा जायेगा गाय के गोबर से लिपती है और पर्व से एक दिन पहले नहाया खाय के ब्रत रखती है इस पर्व को कही कही तीन दिन मनाया जाता है जिसे नियम संयम से सूर्य उपासना का ब्रत रखती है यह पर्व बिहार से प्रचलन शुरूआत हुई और आज पूरे भारत मे मनाया जा रहा है 7 नवम्बर को यह ठालाछठ सूर्य उपासना का पर्व बड़े धूमधाम से मनाई जायेगी जिसे नगर के सभी सरोवर पोखरा की घाटो की साफ सफाई के साथ लाइट की विशेष व्यवस्था की जा रही है श्रीनाथ मठ स्थिति पोखरे रोशा शाह पोखरा खिरोधर का पोखरा छोटी बवली बड़ी बवली पोखरे की साफ-सफाई तेजी से चल रहा है छठ पुजा के लिए ग्रामीण क्षेत्र में लोग पूरे जोर शोर से जुट गये है नगर बाजार चट्टी आदि जगहो पर फलो की दुकान ने सज गई है वही सूप दवरी डलिया बांस के बने खरीदारी कर पुजा की तैयारी कर रहे है।इस पर्व पर कपड़े साड़ी की खरीदारी के लिए लोगो की संख्या में इजाफा हुआ है छठ को लेकर बच्चो के परिधान खरीदने के लिए रेडीमेड की दुकानो पर भीड़ लगी देखा गया है जिसे इस पर्व लोग उत्साह व उमंग के साथ डालाछठ सूर्य उपासना का पर्व मनाने की तैयारी कर रहे है। यह सूर्य उपासना का पर्व डाला छठ पुत्र प्राप्ति सुख समृद्धि के लिए महिलाएं निर्जला रखती है और
प्रथम दिन घर की साफ-सफाई कर, तामसिक भोजन, लहसुन, प्याज इत्यादि का त्याग कर व्रती महिलाएं एक दिन पहले एक भात (चावल), चने का दाल लवकी की सब्जी नहाया खाय व्रत रहती है। दूसरे दिन निर्जला व्रत रहती है और जमीन पर सोती है।, दिन भर उपवास कर सायंकाल डाला छठ की तिथि पर निराहार रहकर, बांस की सूप, डालियों में विभिन्न प्रकार के फल-मिष्ठान, नारियल, ऋतु फल, ईख आदि रखकर किसी नदी, तालाब, पोखरा, बावड़ी के किनारे दूध तथा जल छाक से अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देती है, और रात्रि के समय अगले दिन के लिए प्रातः भोर में घाटो पर जाकर जल में रहकर सूर्योदय के समय तक सूर्यदेव को उदमान होने पर अर्घ्य देती हैऔर लोक मंगल की कामना करती है घर आकर व्रत तोड़ती हैऔर पारन करती है यह पर्व महिलाए पुत्र प्राप्ति व घर परिवार में सुख शांति समृद्धि के लिए किया जाता है।

